डॉ. आशीष कुमार चाचोंदिया
साराशं
यह लेख शिवलिंग के प्रतीकात्मक अर्थ को व्याख्यायित करता है और इसके साथ विशेष रूप से गुप्तकालीन मुखलिंग की प्रतिमा विज्ञान परंपरा को भी प्रस्तुत करता है । वस्तुतः लिंग को केवल किसी एक अर्थ में सीमित करना न तो लिखित साक्ष्यों के अनुकूल है और न ही प्राचीन प्रतिमाओं की रूप-रचना के। शैव दर्शन में स्तंभ, ज्योति, बिंदु और सृष्टि-शक्ति के रूपक लिंग को, चेतना तथा विश्व-व्यापी सत्ता के संकेत के रूप में रखा जाता है; लेकिन मुखलिंग के सन्दर्भ में अर्थ कुछ भिन्न प्रकट होते हैं । वस्तुतः मुखलिंग लिंग रूप के अमूर्त संकेत को साकार देव-उपस्थिति से जोड़ता है। उचाहरा, खोह, भूमरा और राजघाट की प्रतिमाओं के तुलनात्मक अध्ययन से स्पष्ट होता है कि शिल्प में समाधि, राजस गरिमा और नियंत्रित अलंकरण के माध्यम से शिव की आंतरिक शक्ति को दृश्य बनाया गया है। भीटा और गुडीमल्लम् के उदाहरण इसके संदर्भ, आकृति, पाठ और पूजा-व्यवहार को साथ पढ़ने की आवश्यकता को भी दिखाते हैं।
शब्द कुंजी: शिवलिंग, मुखलिंग, शैव प्रतिमाविज्ञान, समाधि, प्रतीकवाद
